Wednesday, August 28, 2013

आर्य

आर्य    

संस्कृत शब्द आर्य का मतलब होता था कुलीन और सभ्य । इसलिये पुराने इतिहारकारों, जैसे मॅक्स म्युलर ने आदिम- और आधुनिक हिन्द-यूरोपीय भाषा बोलने वाली जातियों का नाम "आर्य" रख दिया । ये नाम यूरोपीय लोगों को क़ाफ़ी पसन्द आया और जल्द ही सभी यूरोपीय वासियों ने अपने अपने देशों को प्रचीन आर्यों की जन्मभूमि बताना शुरूकर दिया (ये बात आजतक जारी है) । ख़ासतौर पर हिट्लर प्रचारित किया कि प्राचीन आर्यों की जन्मभूमि जर्मनी ही है, और आर्य का अर्थ शुद्ध नस्ल का मनुष्य है, जिसकी त्वचा गोरी, क़द लम्बा, आँखे नीली और बाल सुनहरे हैं । हिट्लर के मुताबिक जर्मन लोग ही सर्वोच्च और सर्वशक्तिमान नस्ल के हैं, और ख़ास तौर पर यहूदी लोग घटिया नस्ल के और अनार्य हैं (और जीने के लायक भी नहीं) । ब्रिटिश लोगों ने प्रचारित किया कि लगभग 1700 ई.पू. में हिन्द-आर्य कबीलों ने यूरोप से आकर सिन्धु-घाटी में आक्रमण किया और भारत की देशी सिन्धु घाटी सभ्यता को उजाड़ दिया और उसके निवासियों का नरसंहार किया और बाद में बचे-खुचे लोगों को ग़ुलाम बना लिया -- जिनको ऋग्वेद में दास और दस्यु कहा गया है (इस तरह वो अपने उपनिवेशवाद को सही ठहराना चाहते थे ) ।
हिट्लर के यहूदी नरसंहार के बाद अब "आर्य" शब्द का मतलब भाषाई अर्थ में लगाया जाता है, न कि नस्ल के लिये । पर अभी भी इतिहासकार और भाषाविद आर्यों की जन्मभूमि की खोज कर रहे हैं । एक विचारधारा के मुताबिक आर्यों की जन्मभूमि मध्य एशिया में थी, शायद दक्षिणी रूस या कैस्पियन सागर के आस-पास । वहीं से उनके कबीले दुनिया के कई देशों में पहुँचे । हिन्द-आर्य कबीलों का भारतीय उपमहाद्वीप में प्रवास धीरे-धीरे और शान्तिपूर्वक हुआ था, और ब्रिटिश इतिहासकारों की "ख़ून-खराबे" वाली बातों का कोई प्रमाण नहीं है । उस वक़्त (1800 ई.पू.) तक सिन्धु-घाटी सभ्यता या तो भूकम्पों से या सिन्धु-सरस्वती नदियों की धारा में बदलाव और सूखे की वजह से ख़ुद ही तबाह हो गयी थी । ये विचारधारा आजकल दुनिया के ज़्यादातर भाषाविद और इतिहासकार मानते हैं । मध्य एशिया के "कुरगन कब्र-टीले" प्राचीन आर्यों द्वारा बनाये गये माने जाते हैं । एक दूसरी विचारधारा के मुताबिक प्राचीन आर्यों की जन्मभूमि भारत ही है, और यहीं से आर्य कबीले यूरोप और बाकी एशिया में प्रवास किये । इस बात को कई भारतीय और हिन्दुत्व-वादी मानते हैं (और ये भी कि सिन्धु-सरवती सभ्यता आर्यों की सभ्यता थी और बाकी हिन्द-यूरोपीय भाषाएँ संस्कृत से विकसित हुई हैं), पर बाकी दुनिया में इस दृष्टिकोण की कोई कद्र नहीं है । ज़्यादातर भाषाविदों के मुताबिक "आदिम-हिन्द-यूरोपीय" भाषा के पुनर्निर्मित शब्द यही इशारा करते हैं कि प्राचीन आर्य जन्मस्थान एक विशाल, शीतोष्ण घास का चारागाह था । वैसे भी भारतीय जलवायु और पशु-पक्षियों के शब्दों के लिये यूनानी, लैटिन, जर्मन, और अन्य हिन्द्-यूरोपीय भाषाओं में मिलते जुलते शब्द नहीं मिलते, जैसे मोर, मुर्गा, बाघ, हाथी, आम, केला, पीपल, बरगद, नीम, गर्म-मौसम, गैण्डा, भैंस, चावल, इत्यादि । साथ-ही-साथ, सिन्धु घाटी सभ्यता में बड़े शहर, मछ्ली का उपभोग, 2000 ई.पू. से पहले घोड़े की पूरी ग़ैरहाज़िरी और बाद में भी घोड़ों के बहुत ही कम अवशेष, उनके देवताओं के चित्रों का वैदिक देवताओं से भिन्न होना, उनका बाघ और बैल को आदर जबकि ऋग्वेद में बब्बर-शेर और गाय अधिक उल्लेखित हैं, उनके अधिकांश शहरों में (कालीबंगन, आदि को छोड़कर) वैदिक यज्ञ-अग्नि-वेदी का अभाव, इत्यादि यही इशारा करते हैं कि इसके निवासी आर्य तो नहीं थे । जो भी हो, ये सवाल आज भी तीखी नोक-झोंक का केन्द्र बना हुआ है ।

Tuesday, August 27, 2013

खाद्य सुरक्षा बिल

खाद्य सुरक्षा बिल 
दिनांक २६ अगस्त २०१३ का दिन भारत की जनता के लिए बहुत ही महत्व का दिन बन गया है. एस दिन लोक सभा ने खाद्य सुरक्षा बिल को पारित किया , पहले तो मैं सब ससद  सदस्यों  को बधाई देता हूँ कि  उन्हे भूखों का ख्याल तो  आया।  उसके बाद मैं  कांग्रेस की अद्यक्ष   को बधाई देता  हूँ , समस्त देश वासी उम्मीद लगाकर इंतजार करतें हैं कि  नेताओं की अच्छी  सोच देश को और आगे ले जायेगी।  लेकिन  उन लोगों को सबक लेना चाहिए कि देश की राजनीती एक राज्य से नहीं चलती बल्कि दुसरे भी राज्य हैं वहां  भी उन्है  अपनी जमीन तलाशनी चाहिये।  ताकि उनके जो सुझाव हों वे दराशाही न हों। सरकार  यह दावा करती है कि ६७ प्रतिशत लोगों को सस्ता खाना उपलब्ध होगा मैं कहता हूँ कि अगर  25 प्रतिशत लोगों को भी इस  बिल से फायदा होता है. तो भी यह बिल सफल हो जायगा।  एस बिल से लोगों को हर हालत में  लाभ होग.]
 द्वारा-भजन सिंह घारू 

बाल मज़दूरी

 भारत में 14 साल के बच्चों की आबादी पूरी अमेरिकी आबादी से भी ज़्यादा है. भारत में कुल श्रम शक्ति का लगभग 3.6 फीसदी हिस्सा 14 साल से कम उम्र के बच्चों का है. हमारे देश में हर दस बच्चों में से 9 काम करते हैं. ये बच्चे लगभग 85 फीसदी पारंपरिक कृषि गतिविधियों में कार्यरत हैं, जबकि 9 फीसदी से कम उत्पादन, सेवा और मरम्मती कार्यों में लगे हैं. स़िर्फ 0.8 फीसदी कारखानों में काम करते हैं. आमतौर पर बाल मज़दूरी अविकसित देशों में व्याप्त विविध समस्याओं का नतीजा है. भारत सरकार दूसरे राज्यों के सहयोग से बाल मज़दूरी ख़त्म करने की दिशा में तेज़ी से प्रयासरत है. इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सरकार ने राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजना (एनसीएलपी) जैसे महत्वपूर्ण क़दम उठाए हैं. आज यह कहने की ज़रूरत नहीं है कि इस परियोजना ने इस मामले में का़फी अहम कार्य किए हैं. इस परियोजना के तहत हज़ारों बच्चों को सुरक्षित बचाया गया है. साथ ही इस परियोजना के तहत चलाए जा रहे विशेष स्कूलों में उनका पुनर्वास भी किया गया है. इन स्कूलों के पाठ्यक्रम भी विशिष्ट होते हैं, ताकि आगे चलकर इन बच्चों को मुख्यधारा के विद्यालयों में प्रवेश लेने में किसी तरह की परेशानी न हो. ये बच्चे इन विशेष विद्यालयों में न स़िर्फ बुनियादी शिक्षा हासिल करते हैं, बल्कि उनकी रुचि के मुताबिक़ व्यवसायिक प्रशिक्षण भी दिया जाता है. राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजना के तहत इन बच्चों के लिए नियमित रूप से खानपान और चिकित्सकीय सहायता की व्यवस्था है. साथ ही इन्हें एक सौ रुपये मासिक वजी़फा दिया जाता है. ग़ैर सरकारी संगठनों या स्थानीय निकायों द्वारा चलाए जा रहे ऐसे स्कूल इस परियोजना के अंतर्गत अपना काम भलीभांति कर रहे हैं. हज़ारों बच्चे मुख्य धारा में शामिल हो चुके हैं, लेकिन अभी भी कई बच्चे बाल मज़दूर की ज़िंदगी जीने को मजबूर हैं. समाज की बेहतरी के लिए इस बीमारी को जड़ से उखाड़ना बहुत ज़रूरी है. एनसीएलपी जैसी परियोजनाओं के सामने कई तरह की समस्याएं हैं. यदि हम सभी इन समस्यायों का मूल समाधान चाहते हैं तो हमें इन पर गहनता से विचार करने की ज़रूरत है. इस संदर्भ में सबसे पहली ज़रूरत है 14 साल से कम उम्र के बाल मज़दूरों की पहचान करना. आख़िर वे कौन से मापदंड हैं, जिनसे हम 14 साल तक के बाल मज़दूरों की पहचान करते हैं और जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मान्य हों? क्या हमारा तात्पर्य यह होता है कि जब बच्चा 14 साल का हो जाए तो उसकी देखभाल की जिम्मेदारी राज्य की हो जाती है? हम जानते हैं कि ग़रीबी में अपना गुज़र-बसर कर रहे बच्चों कोपरवरिश की ज़रूरत है.  कोई बच्चा जब 14 साल का हो जाता है और ऐसे में सरकार अपना सहयोग बंद कर दे तो मुमकिन है कि वह एक बार फिर बाल मज़दूरी के दलदल में फंस जाए. यदि सरकार ऐसा करती है तो यह समस्या बनी रह सकती है और बच्चे इस दलदल भरी ज़िंदगी से कभी बाहर ही नहीं निकल पाएंगे. कुछ लोगों का मानना है और उन्होंने यह प्रस्ताव भी रखा है कि बाल मज़दूरों की पहचान की न्यूनतम आयु बढ़ाकर 18 साल कर देनी चाहिए. साथ ही सभी सरकारी सहायताओं मसलन मासिक वजी़फा, चिकित्सा सुविधा और खानपान का सहयोग तब तक जारी रखना चाहिए, जब तक कि बच्चा 18 साल का न हो जाए. मौजूदा नियमों के मुताबिक़, जब बच्चा मुख्य धारा के स्कूलों में दाख़िला ले लेता है तो ऐसा माना जाता है कि मासिक सहायता बंद कर देनी चाहिए. जबकि बच्चे या उसके माता-पिता नहीं चाहते हैं कि वित्तीय सहायता बंद हो. ऐसे में उनका अकादमिक प्रदर्शन नकारात्मक रूप से प्रभावित होता है. यही वजह है कि हर कोई सोचता है कि जब बच्चा मुख्य धारा के स्कूल में प्रवेश कर जाए तो उसके बाद भी उसे सहायता मिलती रहनी चाहिए. आख़िरकार अतिरिक्त पैसे के लिए ही तो माता-पिता अपने बच्चों से मज़दूरी करवाते हैं. इसीलिए किसी भी तरह आर्थिक सहायता जारी रहनी चाहिए. यह तब तक मिलनी चाहिए, जब तक कि वह बच्चा पूर्ण रूप से मुख्य धारा में शामिल होने के क़ाबिल न हो जाए. हालांकि पुनर्वास पैकेज की पूरी व्यवस्था की गई है, फिर भी बच्चे के माता-पिता सरकारी सुविधाओं के हक़दार नहीं माने गए हैं. ऐसे में हर किसी को यह लगता है कि इस संदर्भ में एक सामान्य नियम होना चाहिए, ताकि ऐसे लोगों के  लिए एक विशेष वर्ग निर्धारित हो सके. जैसे एससी, एसटी, ओबीसी, सैनिकों की विधवाओं, पूर्व सैनिक और अपाहिज लोगों के लिए एक अलग वर्ग निर्धारित किया जा चुका है. बाल श्रमिकों की पहचान के संबंध में एक दूसरी समस्या सामने आई है, वह है उम्र का निर्धारण. इस परियोजना ने चाहे जो कुछ भी किया है, लेकिन कम से कम यह बाल मज़दूरी के संदर्भ में पर्याप्त जागरूकता लाई है. अब यह हर कोई जानने लगा है कि 14 साल के बच्चे से काम कराना एक अपराध है. इसीलिए आज जब कोई बाल मज़दूरी की रोकथाम को लागू करना चाहता है तो एक बच्चा ख़ुद अपनी समस्याओं को हमें बताता है. उसके मुताबिक़, काम करने की न्यूनतम आयु 14 साल से कम नहीं होनी चाहिए. लेकिन इसकी जांच-पड़ताल का कोई उपाय नहीं है.  ऐसे में हर कोई ऐसे बच्चों के पुनर्वास के लिए ख़ुद को असहाय महसूस करता है. ये बच्चे न तो स्कूल जाते हैं और न ही इनके जन्म का कोई प्रमाणिक रिकॉर्ड होता है. इसीलिए ये कहीं से भी अपने जन्म प्रमाणपत्र का इंतज़ाम कर लेते हैं और लोगों को उसे मानने के अलावा कोई विकल्प भी नहीं होता. लोगों को यह भी लगता है कि  माता-पिता द्वारा बच्चों को काम करने की छूट देने या उनके कारखानों में काम करने पर प्रतिबंध लगना चाहिए, क्योंकि माता-पिता द्वारा काम पर लगाए जाने वाले ऐसे बच्चों की तादाद भी का़फी अधिक है. इन बच्चों को छोटी उम्र में ही काम पर लगा दिया जाता है और ऐसे लोगों की वजह से ही इन बच्चों पर नकारात्मक असर पड़ता है. एक बार फिर कहना होगा कि इन विशिष्ट स्कूलों में दिए जाने वाले व्यवसायिक प्रशिक्षणों में भी कुछ ख़ामियां हैं. हालांकि मौजूदा नियमों के मुताबिक़ व्यवसायिक प्रशिक्षण का प्रावधान तो है, लेकिन इसके लिए धन का अलग से आवंटन नहीं होता है, जिससे इस तरह के कार्यक्रमों को सफलतापूर्वक चलाने में कई मुश्किलें आती हैं. बाल मज़दूरी ख़त्म करने और व्यवसायिक प्रशिक्षण का लक्ष्य हासिल करने के लिए सबसे पहले हमें उपर्युक्त पहलुओं को समझना बेहद ज़रूरी है. व्यवसायिक प्रशिक्षण के दौरान जिन उत्पादों का निर्माण होता है, उनका विपणन यदि ठीक ढंग से हो तो उसकी लागत पर आने वाले ख़र्च को हासिल किया जा सकता है. लेकिन यह सब परियोजना विशेष, उसके विस्तार और उत्पाद की गुणवत्ता पर निर्भर करता है. साथ ही यह परियोजना का कार्यान्वयन करने वाले व्यक्तिपर भी निर्भर करता है कि वह इन सबका प्रचार-प्रसार ठीक ढंग से कर पा रहा है या नहीं. यह देखने में आया है कि बाल मज़दूरी रोकने संबंधी नियम बन चुके हैं, लेकिन अभी भी इसे ज़मीनी स्तर पर लागू नहीं किया गया है. बाल मज़दूरी को बढ़ावा देने वाले ख़ुद समाज के ग़रीब तबके से आते हैं, इसलिए ऐसे लोगों को हिरासत में लेने या दंडित करने के प्रति भी हमारी कोई रुचि नहीं दिखती. जहां लोग बाल मज़दूरी से परिचित होते हैं, वे इस अपराध से बच निकलने में सफल हो जाते हैं. अत: हमें यहां सुनिश्चित करने की ज़रूरत है कि बाल श्रम अधिनियम (निषेध एवं विनियमन) को सही मायनों में लागू किया जा रहा है या नहीं. यह भी देखा जा रहा है कि जिन बाल मज़दूरों को मुक्त कराया जाता है, उनका पुनर्वास जल्द नहीं हो पाता, नतीजतन वे फिर  इस दलदल में फंस जाते हैं. ऐसे में हमें इसके ख़िला़फ कड़े क़दम उठाने की आवश्यकता है. साथ ही 20 हजार रुपये की राशि एक बाल मज़दूर के पुनर्वास के लिए बेहद ही मामूली राशि है, जिसे बढ़ाए जाने की भी ज़रूरत है. ज़मीनी स्तर पर पुनर्वास को सही ढंग से लागू करने के लिए वित्तीय सहायता के साथ-साथ एक बेहतर पुनर्वास ख़ाका भी बनाया जाना चाहिए. कई सरकारें बाल मज़दूरों की सही संख्या बताने से बचती हैं. ऐसे में वे जब विशेष स्कूल खोलने की स़िफारिश करती हैं तो उनकी संख्या कम होती है, ताकि उनके द्वारा चलाए जा रहे विकास कार्यों और कार्यकलापों की पोल न खुल जाए. यह एक बेहद महत्वपूर्ण पहलू है और आज ज़रूरत है कि इन सभी मसलों पर गहनता से विचार किया जाए. यदि सरकार सही तस्वीर छुपाने के लिए कम संख्या में ऐसे स्कूलों की स़िफारिश करती है तो यह नियमों को लागू करने एवं बाल श्रमिकों को समाज की मुख्य धारा में जोड़ने की दिशा में एक गंभीर समस्या और बाधा है. जब तक पर्याप्त संख्या में संसाधन उपलब्ध नहीं कराए जाएंगे, ऐसी समस्याओं से निपटना मुश्किल ही होगा. यहां बाल श्रम से निपटने की दिशा में न स़िर्फ नए सिरे से सोचने की आवश्यकता है, बल्कि इसके लिए कार्यरत विभिन्न परियोजनाओं को वित्तीय सहायता आवंटित करने की भी ज़रूरत है. कुछ मामलों में बाल श्रमिकों की पहचान की ज़रूरत तो नहीं है, लेकिन इन परियोजनाओं में कुछ बुनियादी संशोधन की आवश्यकता ज़रूर है. इस देश से बाल मज़दूरी मिटाने के लिए अधिक समन्वित और सहयोगात्मक रवैया अपनाने की सख्त आवश्यकता है.

Sunday, August 25, 2013

रेप जैसी घिनोना अपराध करने वालों पर अंकुश

माननीय  सादर नमन ,
आप को मैं कुछ सुझाव भेज रहा हूँ उम्मीद करता हूँ कि आप इन्हे अपनी रेप जैसी घिनोना अपराध करने वालों पर अंकुश लगेगा-  
कोड आफ कंडक्ट देश के सारे नागरिकों के बनना चाहिये-
१.१५ साल से अधिक उम्र के सदस्यों को अपना धंधा / काम सरकारी agancy को लिखित में बताना हो? जैसे ही वह अपना काम बदले तुरंत उसकी जानकारी सरकारी कार्यलय में देवें.
वे अपने अपने काम की जानकारी लिखत में देगें तो साथ ही परिवार के मुखिया की भी जिमेधारी रहेगी अगर ऐसा न  करने  की एवज में अपराध उसकी फेमिली का कोई सदस्य कर देता है तो उस परिवार को भी जिमेदार ठहराया जाय.कयोकि कुछ रहिसजादे खाली आवारागर्दी ही करते हैं.
२.मतदान तथा चुनाव में खड़े होने से रोका जाना चाहिए? अपराध की मात्रा के आधार पर उसकी फॅमिली पर भी मतदान में भाग लेने तथा किसी भी  तरह चुनाव में खड़े होने पर अंकुश लगाया जाना जरुरी है.
३.सम्पति खरीदने वंचित किया जाना चाहिए?अपराध की मात्रा के आधार पर उसकी फॅमिली पर भी सम्पति  की खरीद-फरोक्त करने पर  प्रतिबद्ध लगे  तथा  अपराध की मात्रा तथा उसकी गंभीरता  के आधार उसे या पूरी फॅमिली को दिवालिया धोषित कर देना  जरुरी है.उसे (अपराधी को  )पारिवारिक सम्पति से वंचित किया जाना चाहिए?
4.अपराध की मात्रा के आधार पर  उसे (अपराधी को ) मर्त्यु दंड दिया जाना जरुरी है?लेकिन केस को ३ से ६ महीने के अन्दर ही निपटाया जाय. तथा केवल  एक ही मुक्का अपील का रखा जाय. जिस अदालत ने उसको सजा सुने है उससे उपरी अदालत मे ही अपील कर सकेगा
5.कोई भी रेप जैसा अपराध होने पर जाँच करने का जबकि उप-अधिशक का प्रावधान पहले से ही परन्तु वे तो न तो पीड़ित महिला के घर जाते हैं और न ही वे खुद पुछ्ताश करते है ऐसे में यह प्रावधान जरुरी है की वादी अगर लिखित मे अदालत मे आवेदन करे की डी० एस० प़ी० ने खुद द्वारा जाँच नहीं हुई है तो ऐसे मे उप-अधिसक को लापरवाही तथा  अपराध करने वालों का सहायता करने का आरोप लगाकर अदालत सज्ञान ले. अगर सेवा काल के दोरान दो से जायदा मे लिप्त पाया जाता है तो उसे सेवा से हटा देना चाहिए.
6 मेरे ख्याल मे नापुशक करना कुदरत के विपरीत है. बस नियमों की कड़ाई के साथ पालन करने की जरुरत है. धन से वंचित, दिवलिपन , परिवार के विरुद्ध कारवाही, चुनाव जैसे अदिकारों से वंचित करना , सम्पति से बदखल करना काफी है.
६.अपराधमुक्त समाज के गठन में सब का सहयोग जरुरी है. सभी लोग- जिसमे हर आदमी -टीचर , वकील, दूकानदार, पञ्च, सरपंच, विधायक , सासद, ससद कर्मचारी , गर कर्मचारी , ठेकेदार, औरत बेटा-बेटी माँ,बहिन भाई, चाचा मामा  आदि सब का फर्ज है की वे समाज के निर्माण मे अपना योगदान देवे, तथा अपने-अपने बच्चों  को अच्छा सस्कार व् पालन-पोषण सही तरीके से करें.
7.ऐसे घिनोने अपराधों को रोकने के फास्ट कोर्ट का होना अतिअव्सक है. इसमें सेवा-निवर्त हो चुके शिक्क्षा-विद -प्राचार्य (उच्च-माद्यमिक ,डिग्री महा-विद्यालय ,) मजिस्ट्रेट , क्लास एक अधिक्कारी ,अन्य उच्च अधिकारी आदि की सहायता ली जा सकती है.
8.ऐसे अपराधों की पैरवी  करने वकील सरकारी हो तथा गैर सरकारी भी अपनी सेवाए दे वादी अदालत से निवेदन करे की अमुक गैर सरकारी वकील की भी जरुरत है तो अदालत उस वकील को आदेश देवे और वह वकील ठीक से सपोर्ट नहीं करता है तो अदालत उस वकील का प्रमाण पत्र रद्द करे.फैसला देते समय अदालत को वकील की भूमिका पर भी टिपणी करनी चाहिए
धन्यवाद !
भजन सिंह घारू

Monday, August 19, 2013

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उत्पादन बढ़ा, पर कृषि योग्य भूमि का रकबा घटा

उत्पादन बढ़ा, पर कृषि योग्य भूमि का रकबा घटा

स्वतंत्रता बाद देश की विशाल आबादी को भोजन मुहैया कराने की चुनौतियों के बीच पिछले तीन दशकों में कृषि योग्य भूमि का रकबा 54 लाख हेक्टेयर कम हुआ है।
   
कृषि मंत्रालय की 2011-12 की रिपोर्ट के अनुसार, स्वतंत्रता से पहले के समय में अनाज की कमी के अनुभव के कारण खाद्यान्न में स्वाबलंबन पिछले 60 वर्षों में हमारी नीतियों का केंद्र बिन्दु रहा है और खाद्यान्न उत्पादन का इस संबंध में अहम स्थान रहा है। हालांकि कुल अनाज उत्पादन में खाद्यान्न का हिस्सा 1990-91 में 42 प्रतिशत से घटकर 2009-10 में 34 प्रतिशत रह गया है।
   
जाने माने कृषि वैज्ञानिक प्रोफेसर एम एस स्वामीनाथन ने कहा कि अगर खाद्यान्न का उत्पादन नहीं बढ़ता है, तब भारत को आने वाले समय में गंभीर समस्या का सामना करना पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि कषि योग्य भूमि का रकबा घट रहा है, खेती में रूचि कम हो रही है और कृषि लागत बढ़ रही है। ऐसे में सरकार को किसानों के हितों को ध्यान में रखते हुए दीर्घावधि कषि नीति तैयार करना चाहिए। 
   
भारत ने हरित क्रांति रणनीति अपना कर खाद्यान्न उत्पादन में स्वावलंबन प्राप्त करने की दिशा में काफी प्रगति की है। इसके फलस्वरूप खाद्यान्न उत्पादन 1960-61 में 8.2 करोड़ टन से बढ़कर 2011-12 में 25 करोड़ टन हो गया।
   
हालांकि कृषि योग्य भूमि के रकबा में लगातार गिरावट दर्ज की गई है। यह 1979 के 16.34 करोड़ हेक्टेयर से घटकर 2009 में 15.80 करोड़ हेक्टेयर रह गया है। पिछले तीन दशकों में कृषि योग्य भूमि का रकबा 54 लाख हेक्टेयर कम हुआ है।