कुछ नहीं कर सकते ,
जिसके हाथ में पॉवर है वे करना नहीं चाहते यानि उनकी मंशा ठीक नहीं, तथा जो करना चाहते हैं उनके हाथ में पॉवर नहीं हैं। बहुत बार मंत्री स्तर के नेता ऐसा कहते सुना की कानून वाव्स्था ठीक नहीं हैं जबकि उसके पास कितनी पॉवर हैं यह हम और आप भी जानते हैं। पर वह कुछ करना नहीं चाहते। खली लोगों को बेवकूफ बनाते हैं, जिस दिन आम जनता को यह बात समझ आ जाएगी उस दिन सब ठीक हो जायेगा। मैं उस दिन का इतजार करूंगा । आम लोगों का भला भी तभी होगा॥
द्वारा- भजन सिंह घारू
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Friday, May 27, 2011
Monday, May 9, 2011
वो लम्हा,
वो लम्हा ,
फिर वो लम्हा सपने में आ टपका, मन विचलित हुआ।
कहीं पुन ऐसा हुआ तो क्या होगा।
चिंता में डूबी नाव , चेहरे का रंग बदल गया,
मित्र भी पराये से लगते हैं, पराये भी धुत्कारतें हैं।
कहाँ से आ गया दिमाग चाटने को,
जेब मुद्राविहीन, नगर का चक्र कटा, दोटू टका दबाये हुए,
कितनी बार चक्षु भीगे, गिनके तो उदासी होती है।
अरदास उस से यहीं करूगां , ऐसे सपनो का क्रम टूटे, कहीं सच हो गया तो,
मन चिंता में डूब गया।
चेहरे का रंग फीका होने लगा।
सपने तो सपने हैं, न अपने हैं,बस सपने हैं॥
सव रचित-भजन सिंह घारू
फिर वो लम्हा सपने में आ टपका, मन विचलित हुआ।
कहीं पुन ऐसा हुआ तो क्या होगा।
चिंता में डूबी नाव , चेहरे का रंग बदल गया,
मित्र भी पराये से लगते हैं, पराये भी धुत्कारतें हैं।
कहाँ से आ गया दिमाग चाटने को,
जेब मुद्राविहीन, नगर का चक्र कटा, दोटू टका दबाये हुए,
कितनी बार चक्षु भीगे, गिनके तो उदासी होती है।
अरदास उस से यहीं करूगां , ऐसे सपनो का क्रम टूटे, कहीं सच हो गया तो,
मन चिंता में डूब गया।
चेहरे का रंग फीका होने लगा।
सपने तो सपने हैं, न अपने हैं,बस सपने हैं॥
सव रचित-भजन सिंह घारू
Sunday, May 8, 2011
चीखं
चीखं ,
संभाले रखूं चीख मेरी आखरी बची हुई।
ये गई ,वो गई, हर चीख मेरी सच्ची हुई॥
कोई खा रहा था, किसी का पेट काटकर,
कोई नहा रहा था, बरसात जो बची हुई॥
चल रहे थे साथ मिलकर, एक आगे सटक गया,
बाकि हाथ मलते रहे, दूजे कहें ये अच्छी हुई॥
हमें तो अपनों ने मारा, गेरों में कहाँ दम था ,
पता भी न चला , न पहचान उबरी दबी हुई॥
चीखों में चीखे निकलती रही, हर बार क़यामत आती रही,
शमशान से दुरी कम न रही, बस बर्बाद कभी न कमी हुई॥
संभालें रखूं चीख मेरी आखरी बची हुई।
ये गई, वो गई, हर चीख मेरी सच्ची हुई॥
सव-रचित- भजन सिंह घारू
संभाले रखूं चीख मेरी आखरी बची हुई।
ये गई ,वो गई, हर चीख मेरी सच्ची हुई॥
कोई खा रहा था, किसी का पेट काटकर,
कोई नहा रहा था, बरसात जो बची हुई॥
चल रहे थे साथ मिलकर, एक आगे सटक गया,
बाकि हाथ मलते रहे, दूजे कहें ये अच्छी हुई॥
हमें तो अपनों ने मारा, गेरों में कहाँ दम था ,
पता भी न चला , न पहचान उबरी दबी हुई॥
चीखों में चीखे निकलती रही, हर बार क़यामत आती रही,
शमशान से दुरी कम न रही, बस बर्बाद कभी न कमी हुई॥
संभालें रखूं चीख मेरी आखरी बची हुई।
ये गई, वो गई, हर चीख मेरी सच्ची हुई॥
सव-रचित- भजन सिंह घारू
तीन मंत्रियों की दरकार
तीन मंत्रियों की दरकार,
कहिये जनाब , आपकी है सरकार।
मेरे तीन मंत्री हैं ! है दरकार, है दरकार॥
मार्ग बदला ,सिंदांत छोड़ा, साथ पकड़ा है तुम्हारा।
तुम चाल चलो, हर बार लात खाय , यहीं किस्मत है हमारा॥
तुम्हारी सत्ता ही बदल देगें, हर बंद है कामकाज।
मेरे तीन मंत्री हैं, है दरकार, है दरकार॥
मेरे शेत्र में विचरण करना हो, इनका साथ जरुरी है।
दशिन की गंगा में दुबकी, तो खैरात बटाना जरुरी है।
नंबर एक बन्दा हो तेरा, तो शर्म न करो सरकार॥
मेरे तीन मंत्री है, है दरकार, है दरकार॥
सव-रचित -भजन सिंह घारू
कहिये जनाब , आपकी है सरकार।
मेरे तीन मंत्री हैं ! है दरकार, है दरकार॥
मार्ग बदला ,सिंदांत छोड़ा, साथ पकड़ा है तुम्हारा।
तुम चाल चलो, हर बार लात खाय , यहीं किस्मत है हमारा॥
तुम्हारी सत्ता ही बदल देगें, हर बंद है कामकाज।
मेरे तीन मंत्री हैं, है दरकार, है दरकार॥
मेरे शेत्र में विचरण करना हो, इनका साथ जरुरी है।
दशिन की गंगा में दुबकी, तो खैरात बटाना जरुरी है।
नंबर एक बन्दा हो तेरा, तो शर्म न करो सरकार॥
मेरे तीन मंत्री है, है दरकार, है दरकार॥
सव-रचित -भजन सिंह घारू
Saturday, May 7, 2011
भाषा
भाषा,
भाषा कोई भी हो उस का सार्थक ज्ञान होना जरुरी है। भाषा एक विचारों को आदान -प्रदान करने का एक झरिया है, जिस से हम एक-दूजे के विचारों को समझ व् आत्मसात कर लेतें हैं। हाँ यह जरुर मैं कहूँगा की आज के समय में ऊँचा दिखाने के लिए अंग्रेजी को अधिक महत्व देतें हैं, यह नहीं की उन को हिंदी नहीं आती बल्कि यह है की उन को अंग्रेजी भी अच्छी तरह से नहीं आती। यह कहीं नहीं लिखा हुआ की अच्छी हिंदी जानने वाला अच्छी हिंदी बोल सकता है, और यह भी कहीं नहीं लिखा हुआ की अच्छी अंग्रेजी जानने वाला अच्छी अंग्रेजी बोल सकता है। यहाँ एक बात और भी कह देना जरुरी समझता की भाषा से किसी की विधद्ता को नहीं नापा जा सकता ।
मि० बाकलीवाल तथा मैं भी हिंदी में लिखता हूँ कितने लोग आपको और मेरे विचारों को पढ़ते या फोलो करते हैं। नेताओं , अभिनत्रियों तथा अन्य उच्च लोगों के बोल्ग्स का सब पीछा करते हैं।
गुलामी की बू हम से दूर नहीं हो प् रहीं ,
खेलों हमारा पसीना बहा । चद लोग अपनी तोंद भर गए ।
द्वारा-भजन सिंह घारू
भाषा कोई भी हो उस का सार्थक ज्ञान होना जरुरी है। भाषा एक विचारों को आदान -प्रदान करने का एक झरिया है, जिस से हम एक-दूजे के विचारों को समझ व् आत्मसात कर लेतें हैं। हाँ यह जरुर मैं कहूँगा की आज के समय में ऊँचा दिखाने के लिए अंग्रेजी को अधिक महत्व देतें हैं, यह नहीं की उन को हिंदी नहीं आती बल्कि यह है की उन को अंग्रेजी भी अच्छी तरह से नहीं आती। यह कहीं नहीं लिखा हुआ की अच्छी हिंदी जानने वाला अच्छी हिंदी बोल सकता है, और यह भी कहीं नहीं लिखा हुआ की अच्छी अंग्रेजी जानने वाला अच्छी अंग्रेजी बोल सकता है। यहाँ एक बात और भी कह देना जरुरी समझता की भाषा से किसी की विधद्ता को नहीं नापा जा सकता ।
मि० बाकलीवाल तथा मैं भी हिंदी में लिखता हूँ कितने लोग आपको और मेरे विचारों को पढ़ते या फोलो करते हैं। नेताओं , अभिनत्रियों तथा अन्य उच्च लोगों के बोल्ग्स का सब पीछा करते हैं।
गुलामी की बू हम से दूर नहीं हो प् रहीं ,
खेलों हमारा पसीना बहा । चद लोग अपनी तोंद भर गए ।
द्वारा-भजन सिंह घारू
आज फिर हुआ
आज फिर हुआ,
आज फिर हुआ पढ़ा अखबार जो विश्व में बिकता है तथा खबर जो चित्रों सहित छपी बड़ा दुःख हुआ की जिस भगवान् की हम पूजा करते हैं उसकी तस्वीरें जूतों ,चपलों की पर हों तो हमारी बीमार मानसिकता की निशानी हैं। व्योपार या धंधें के लिए भगवान् की तोहीन ठीक नहीं। धन के लालाचिओं को समझना चाहिए की हम से ऊपर भगवान है उस की मर्जी के बिना पत्ता भी हिल नहीं सकता , जो कोई भी उस से ऊपर जाने की कोशिश करता है तो वह जल्दी ही उसकी अपनी तैयारी भी करा देता है। वैसे हर इंसान को अपने आप ही समझना होगा की जिस से अपनी जीने की दुआ व् आशिशें लेता है उसी को पेरों मे घसीटें कहाँ तक जायज है। एस लिए मेरा मानना है की हमें घटिया कामों से बचना चाहिए। ताकि हम उस के परकोप से बच सकें। आशा करता हूँ की जो भी गूगल ब्लोग्स के माद्यम से एन विचारों को पढ़े तो वह अपने अन्य दोस्तों को भी बतये।
द्वारा- भजन सिंह घारू
आज फिर हुआ पढ़ा अखबार जो विश्व में बिकता है तथा खबर जो चित्रों सहित छपी बड़ा दुःख हुआ की जिस भगवान् की हम पूजा करते हैं उसकी तस्वीरें जूतों ,चपलों की पर हों तो हमारी बीमार मानसिकता की निशानी हैं। व्योपार या धंधें के लिए भगवान् की तोहीन ठीक नहीं। धन के लालाचिओं को समझना चाहिए की हम से ऊपर भगवान है उस की मर्जी के बिना पत्ता भी हिल नहीं सकता , जो कोई भी उस से ऊपर जाने की कोशिश करता है तो वह जल्दी ही उसकी अपनी तैयारी भी करा देता है। वैसे हर इंसान को अपने आप ही समझना होगा की जिस से अपनी जीने की दुआ व् आशिशें लेता है उसी को पेरों मे घसीटें कहाँ तक जायज है। एस लिए मेरा मानना है की हमें घटिया कामों से बचना चाहिए। ताकि हम उस के परकोप से बच सकें। आशा करता हूँ की जो भी गूगल ब्लोग्स के माद्यम से एन विचारों को पढ़े तो वह अपने अन्य दोस्तों को भी बतये।
द्वारा- भजन सिंह घारू
Wednesday, May 4, 2011
नतीजा
नतीजा,
बुरे काम का बुरा नतीजा ,
क्यों भाई चा-चा , अरे हाँ भतीजा,
कबीर जी भी इसी तरह फरमाते हैं, '' बोये पेड़ खजूर का तो आम कहाँ से होए ।
आदमी जो कुछ भी करता है उसका हर एक पल का हिसाब ऊपर वाले के पास रहता है। कौन कितना धनवान है कितना ताकतवर है यह कोई मायने नहीं रखता बस हिसाब रहता है तो इसका की किस ने कितने भले काम किये हैं। और उसे उसी का फल भुगतने के लिए तैयार रहना होगा । अगर कोई मैं में चूर है तो वह सब से बड़ा मुर्ख आदमी है। अंत आदमी को परिणाम को झेलने की भी तैयारी रखनी होगी।
द्वारा- भजन सिंह घारू
बुरे काम का बुरा नतीजा ,
क्यों भाई चा-चा , अरे हाँ भतीजा,
कबीर जी भी इसी तरह फरमाते हैं, '' बोये पेड़ खजूर का तो आम कहाँ से होए ।
आदमी जो कुछ भी करता है उसका हर एक पल का हिसाब ऊपर वाले के पास रहता है। कौन कितना धनवान है कितना ताकतवर है यह कोई मायने नहीं रखता बस हिसाब रहता है तो इसका की किस ने कितने भले काम किये हैं। और उसे उसी का फल भुगतने के लिए तैयार रहना होगा । अगर कोई मैं में चूर है तो वह सब से बड़ा मुर्ख आदमी है। अंत आदमी को परिणाम को झेलने की भी तैयारी रखनी होगी।
द्वारा- भजन सिंह घारू
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