Wednesday, August 28, 2013

राजस्‍थान

राजस्‍थान का नामकरणकर्ता  –  कर्नल जेम्‍स टॉड
  • राजस्‍थान की स्थिति  –  राजस्‍थान भारत के उत्‍तरी-पश्चिमी भाग में 23’’ 3’ उत्‍तरी अक्षांश से 30’’ 12’ उत्‍तरी अक्षांश तथा 69’’ 30’ पूर्वी देशान्‍तर से 78’’ 17’ पूर्वी देशान्‍तर के बीच स्थित है
  • क्षेत्रफल  – 342239 वर्ग किमी
  • राजस्‍थान के सीमावर्ती राज्‍य
  • पूर्वी सीमा पर  -  उत्‍तर प्रदेश
  • उत्‍तरी सीमा पर  - पंजाब व हरियाणा
  • दक्षिणी सीमा पर  - गुजरात
  • सर्वाधिक सीमा वाल पङोसी राज्‍य  - मध्‍य प्रदेश
  • न्‍यूनतम सीमा वाल पङोसी राज्‍य  -  पंजाब
  • राज्‍य से लगने वाली अन्‍तराष्‍टीय सीमा  -  पाकिस्‍तान
  • पाकिस्‍तान से सीमा से लगने वाले जिल  -  श्रीगंगानगर, बीकानेर, जैसलमेर व बाङमेर
  • राज्‍य में पाकिस्‍तान की सीमा का प्रारम्‍भ स्‍थान  -  हिन्‍दुमलकोट (श्रीगंगानगर)
  • क्षेत्रफल के आधार पर सबसे बङा जिला   -   जैसलमेर
  • क्षेत्रफल के आधार पा सबसे छोटा जिला   -   धौलपुर
  • राज्‍य में जिले   -   33 जिलें
  • उपखण्‍ड   -   188 (2005)
  • सम्‍भागों की संख्‍या  -   7
  • देश में सर्वप्रथम पंचायती राज का श्रीगणेश करने वाला जिला   -  नागौर
  • राजस्‍थान की भाषा   -   हिन्‍दी व राजस्‍थानी
  • राजधानी   -   जयपुर (1727 में सवाई जयसिंह द्वारा स्‍थापित)
  • सवोच्‍च पर्वत शिखर   -   गुरू शिखर, 1727 मीटर
  • सार्वाधिक गर्म जिला   -   बीकानेर
  • सार्वाधिक आर्द्र जिला   -   झालावाङ
  • राज्‍य की सबसे लम्‍बी नदी   -  चम्‍बल नदी, 966 किमी
  • राज्‍य में पूर्ण बहाव के आधार पर सबसे लम्‍बी नदी   -  बनास
  • सबसे बङी खारे पानी की झील   -   सांभर
  • सबसे बङी मीठे पानी की झील   -  जयसमंद
  • सबसे प्राचीन पर्वत श्रखला  -   अरावील
  • राजस्‍थान लोक सेवा आयोग  -   अजमेर
  • राजस्‍थान उच्‍च न्‍यायालय  -  जोधपुर
  • राजकीय महाविधालय  -   126
  • राज्‍य का प्रमुख उधोग  -  सूती वस्‍त्र उधोग
  • राज्‍य हवाई उड्रडे  - जयपुर, जोधपुर, उदयपुर व कोटा
  • सीसा, जस्‍ता, टंगस्‍टन व तॉबा उत्‍पादन की द़ष्टि से राज्‍य का देश में स्‍थान  - प्रथम
  • राजस्‍व प्राप्ति में राज्‍य का देश में स्‍थान  - आठवां
  • क़षि उत्‍पादन की द़ष्टि से राज्‍य का देश में स्‍थान  - सातवां
  • सर्वाधिक पशु संख्‍या वाला जिला   - उदयपुर
  • सर्वाधिक गायों वाला जिला   -  उदयपुर
  • राजस्‍थान का हदय   - अजमेर
  • राजस्‍थान का खजुराहो   - जगत, उदयपुर
  • राजस्‍थान का गौरव   - चितौङगढ
  • राजस्‍थान दिवस   - 30 मार्च
  • राजस्‍थान स्‍थापना दिवस   - 1 नवम्‍बर, 1956
  • राजस्‍थान राज्‍य पशु   - चिंकारा
  • राजस्‍थान का राज्‍य पक्षी   - गोडावण
  • राजस्‍थान का राज्‍य पुष्‍प  - रोहिङा के फुल
  • राजस्‍थान राज्‍य व़क्ष  - खेजङी
  • रास्‍थान का ऩत्‍य   - घूमर
  • राजस्‍थान प्रथम मुख्‍यमंत्री   - श्री हीरालाल शास्‍त्री
  • राज्‍य की प्रथम महिला मुख्‍यमंत्री   -  श्रीमती वसुन्‍धरा राजे
  • प्रथम निर्वाचित मुख्‍यमंत्री   - श्री टीकाराम पालीवाल
  • राज्‍य के प्रथम राज्‍यपाल   - श्री गुरूमुख निहालंसिंह
  • प्रथम मुख्‍य न्‍यायाधीश   -  श्री कमलकांत वर्मा
  • प्रथम विधान सभा अध्‍यक्ष   -  श्री नरोत्‍तम जोशी
  • राज्‍य की प्रथम महिला विधान सभा अध्‍यक्ष   - श्रीमती सुमित्रा सिंह
  • राज्‍य की पहली महिला प्‍लाइंग ऑफीसर   -  निवेदिता
  • राज्‍य की पथाम महिला पायलट   -  नम्रता भट्ट
  • पहली राजस्‍थानी फिल्‍म   -  निजराणो,  1942
  • इंग्लिश चैनल तैरकर पार करने वाली रास्‍थान की प्रथम महिला   -  भक्ति शर्मा, जुलाई 2006


राजस्‍थान सामान्‍य ज्ञान - राजस्‍थान का भौगोलिक स्‍वरूप

राजस्‍थान के प्राक़तिक विभाग
1 पूर्वी राजस्‍थान – जयपुर, दौसा, अलवर, धौलपुर, सवाई माधोपुर, भरतपुर, टोंक, सीकर, अजमेर व करौली
2 दक्षिण-पूर्वी राजस्‍थान – कोटा, बारां, बूंदी एवं झालावाङ
3 दक्षिण राजस्‍थान – उदयपुर, राजसमंद, भीलवाङा, चितौङगढ, डूंगरपुर व बांसवाङा
4 पश्चिमी राजस्‍थान – जैसलमेर, नारौग, जोधपुर, बाङमेर, जालौर, सिरोही व पाली
5 उत्‍तरी राजस्‍थान – बीकानेर, श्रीगंगानगर, हनुमानगढ व चुरू

राजस्‍थान की प्रमुख नदियों का वर्गीकरण
1 अरब सागर की ओर बहने वाली नदियां – लूणी, माही, सोम, जाखम, साबरमती व प बनास
2 गंगा-यमुना दोआब की ओर बहने वाली नदियां – चम्‍बल, बनास, काली सिन्‍ध, कोठारी, खारी, मेज, मोरेल, बाणगंगा और गम्‍भीर
3 आन्‍तरिक प्रवाह वाली नदियां – घग्‍घर, सोता-साहिबी, काकणी, मेढां, खण्‍डेर, कांटली नदी

राज्‍य की प्रमुख नदियों की लम्‍बाई

1 माही नदी – 576 किमी
2 लूणी नदी – 320 किमी
3 चम्‍बल नदी – 966 किमी
4 बाणगंगा नदी – 380 किमी
5 कोठारी नदी – 145 किमी

राजस्‍थान की झीलों का वर्गीकरण
1 मीठे पानी की झीलें – जयसमंद, राजसमंद, पिछोला, आनासागर, फतेहसागर, उदयसागर, उम्‍मेदसागर, फांयसागर, गैब सागर, सिलीसेढ, कोलायत, पुष्‍कर, बालसमन्‍द, नक्‍की व नवलखा आदि
2 खारे पानी की झीलें – सांभर, पचपद्रा, डीडवाना, फलौदी, कावोद, लूणकरणसर, कछेर व तालछापर

राजस्‍थान में वर्षा जल संग्रहण के उपाय
1 टांका – ये सामान्‍यत चूना, ईंट, पत्‍थर से मकानों के तलघर में बने हुए छोटे हौज होते है, यह पानी पीने के काम लिया जाता है
2 खङीन – मरूस्‍थली भागों में यह एक मंद ढाल वाला ढालू मैदान होता है, पानी सूखने के बाद इसकी दलदली मिट्टी मे रबी की फसल बोई जाती है
3 बाबङियां – बावङियों का निर्माण गांवों या शहरों के समीप किया जाता है जिनमें वर्षा का पानी इकट्ठा होता रहता है,
4 नाडी – ये छोटे-छोटे कच्‍चे तालाब होते हे तथा गांव के बाहर निचले किनारे पर बनाये जाते है
5 सागर व तालाब – इनके जल का उपयोग सिंचाई के लिए किया जाता है

राजस्‍थान के प्रमुख जल प्रपात
1 चूलिया जल प्रपात – चम्‍बल नदी
2 भीमताल जल प्रपात – मांगली नदी

राजस्‍थान की नदियों के उपनाम
1 चम्‍बल नदी – उप नाम कामधेनु, चर्मण्‍वती
2 बाणगंगा – अर्जुन की गंगा
3 बनास – वन की आशा
4 घग्‍घर – म़त नदी
5 माही – बागङ की गंगा


आर्य और दस्यु

आर्य और दस्यु
दस्युओं के रहन-सहन के ढंग से भी आर्य उनके बैरी बन गए। ऐसा लगता है कि आर्यों का पशुपालन आधारित जनजातीय और अस्थायी जीवनक्रम देशीय संस्कृति के स्थायी एवं शहरी जीवन से बेमेल था।  आर्यों का जीवन प्रधानतया जनजातीय जीवन था, जो गण, सभा, समिति और विदथ जैसी विभिन्न सामुदायिक संस्थाओं के माध्यम से रूपायित हुआ है और जिसमें यज्ञ का बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान था। किन्तु दस्युओं को यज्ञ से कोई सरोकार नहीं था। दासों के साथ भी यही बात थी, क्योंकि इन्द्र के बारे में बताया गया है कि वह दास और आर्य का विभेद करते हुए यज्ञस्थल में आता था।  ऋग्वेद के सातवें मंडल का एक सम्पूर्ण सूक्त अक्रतुन, अश्रद्धान्, अयज्ञान् और अयज्वान: जैसे विशेषणों की शृंखला मात्र है। इनका प्रयोग दस्युओं के लिए पुरज़ोर तौर पर यह सिद्ध करने के लिए किया गया है कि उनको यज्ञ पसन्द नहीं था। इन्द्र से कहा गया है कि वे यज्ञपरायण आर्य और यज्ञविमुख दस्युओं के बीच अन्तर करें। ‘अनिंद्र’ शब्द का प्रयोग भी कई स्थलों पर किया गया है,  और अनुमानत: इससे दस्युओं, दासों और सम्भवत: कुछ भिन्न मतावलम्बी आर्यों का बोध होता है। आर्यों के कथनानुसार दस्यु तिलस्मी जादू करते थे। ऐसा मत अथर्ववेद में विशेष रूप से व्यक्त किया गया है। यहाँ दस्युओं को भूत - पिशाच के रूप में प्रस्तुत किया गया है और उन्हें यज्ञ - स्थल से भगाने की चेष्टा की गई है। कहा जाता है कि ‘अंगिरस’ मुनि के पास एक परम शक्तिशाली रक्षा कवच था, जिससे वह दस्युओं के क़िले को ध्वस्त कर सकते थे।  ऋग्वैदिक काल में उन्होंने जो लड़ाइयाँ लड़ी थीं, उनके कारण ही अथर्ववेद में दस्युओं को दुष्टात्मा के रूप में चित्रित किया गया है। अथर्ववेद में कहा गया है कि ईश्वर के निन्दक दस्युओं को बलि वेदी पर चढ़ा दिया जाना चाहिए। ऐसा विश्वास था कि दस्यु विश्वासघाती होते हैं, वे आर्यों की तरह धर्म-कर्म नहीं करते और उनमें मानवता नहीं होती।