हम उन्हेँ अच्छे नहीं लगते।
हम जो पहने कच्छे , अच्छे नहीं लगते।
उपरी सितारों की चमक दमक है दमदार,
अन्दर है मैल दबी हुई, अच्छे नहीं लगते॥
ऊपर की चमड़ी का रंग साफ- सुथरा ,
अन्दर है कालिख पुती हुई, अच्छे नहीं लगते॥
हम जो आह भरे, उनको सहन नहीं होता,
वो जो सरेआम चिंघाड़े ,अच्छे नहीं लगते॥
घिट जाये पूरा सामान जनता का,
हम जो सुखी डकार मारे ,अच्छे नहीं लगते॥
जरा सी पीर से कराह उठाते हैं वो ,
हम पर वारों की करे बोछार, अच्छे नहीं लगते॥
कहतें हैं उनकी बात बड़ा दम है,
हम जो बोले तो लगे बकवास ,अच्छे नहीं लगते॥
सव रचित -भजन सिंह घारू
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Wednesday, June 8, 2011
Saturday, June 4, 2011
खेल बिगाड़ा
जिस का जंहाँ लगा दांव वहां मारा, जीने का आधा खेल बिगाड़ा।
कोई लिपट गया , कोई सटक गया,
कोई अटका गया,
और कोई कर भाग गया॥
जिस का जहाँ लगा---
किसी ने बड़ा भाई बन कर घाँव किए ,
जो कभी अकेला था कहीं,
उस ने भी खंडा खोद डाला।
जिस का जंहाँ लगा धांव वहां मारा ॥
सव-रचित द्वारा- भजन सिंह घारू
कोई लिपट गया , कोई सटक गया,
कोई अटका गया,
और कोई कर भाग गया॥
जिस का जहाँ लगा---
किसी ने बड़ा भाई बन कर घाँव किए ,
जो कभी अकेला था कहीं,
उस ने भी खंडा खोद डाला।
जिस का जंहाँ लगा धांव वहां मारा ॥
सव-रचित द्वारा- भजन सिंह घारू
Friday, May 27, 2011
कुछ नहीं कर सकते
कुछ नहीं कर सकते ,
जिसके हाथ में पॉवर है वे करना नहीं चाहते यानि उनकी मंशा ठीक नहीं, तथा जो करना चाहते हैं उनके हाथ में पॉवर नहीं हैं। बहुत बार मंत्री स्तर के नेता ऐसा कहते सुना की कानून वाव्स्था ठीक नहीं हैं जबकि उसके पास कितनी पॉवर हैं यह हम और आप भी जानते हैं। पर वह कुछ करना नहीं चाहते। खली लोगों को बेवकूफ बनाते हैं, जिस दिन आम जनता को यह बात समझ आ जाएगी उस दिन सब ठीक हो जायेगा। मैं उस दिन का इतजार करूंगा । आम लोगों का भला भी तभी होगा॥
द्वारा- भजन सिंह घारू
जिसके हाथ में पॉवर है वे करना नहीं चाहते यानि उनकी मंशा ठीक नहीं, तथा जो करना चाहते हैं उनके हाथ में पॉवर नहीं हैं। बहुत बार मंत्री स्तर के नेता ऐसा कहते सुना की कानून वाव्स्था ठीक नहीं हैं जबकि उसके पास कितनी पॉवर हैं यह हम और आप भी जानते हैं। पर वह कुछ करना नहीं चाहते। खली लोगों को बेवकूफ बनाते हैं, जिस दिन आम जनता को यह बात समझ आ जाएगी उस दिन सब ठीक हो जायेगा। मैं उस दिन का इतजार करूंगा । आम लोगों का भला भी तभी होगा॥
द्वारा- भजन सिंह घारू
Monday, May 9, 2011
वो लम्हा,
वो लम्हा ,
फिर वो लम्हा सपने में आ टपका, मन विचलित हुआ।
कहीं पुन ऐसा हुआ तो क्या होगा।
चिंता में डूबी नाव , चेहरे का रंग बदल गया,
मित्र भी पराये से लगते हैं, पराये भी धुत्कारतें हैं।
कहाँ से आ गया दिमाग चाटने को,
जेब मुद्राविहीन, नगर का चक्र कटा, दोटू टका दबाये हुए,
कितनी बार चक्षु भीगे, गिनके तो उदासी होती है।
अरदास उस से यहीं करूगां , ऐसे सपनो का क्रम टूटे, कहीं सच हो गया तो,
मन चिंता में डूब गया।
चेहरे का रंग फीका होने लगा।
सपने तो सपने हैं, न अपने हैं,बस सपने हैं॥
सव रचित-भजन सिंह घारू
फिर वो लम्हा सपने में आ टपका, मन विचलित हुआ।
कहीं पुन ऐसा हुआ तो क्या होगा।
चिंता में डूबी नाव , चेहरे का रंग बदल गया,
मित्र भी पराये से लगते हैं, पराये भी धुत्कारतें हैं।
कहाँ से आ गया दिमाग चाटने को,
जेब मुद्राविहीन, नगर का चक्र कटा, दोटू टका दबाये हुए,
कितनी बार चक्षु भीगे, गिनके तो उदासी होती है।
अरदास उस से यहीं करूगां , ऐसे सपनो का क्रम टूटे, कहीं सच हो गया तो,
मन चिंता में डूब गया।
चेहरे का रंग फीका होने लगा।
सपने तो सपने हैं, न अपने हैं,बस सपने हैं॥
सव रचित-भजन सिंह घारू
Sunday, May 8, 2011
चीखं
चीखं ,
संभाले रखूं चीख मेरी आखरी बची हुई।
ये गई ,वो गई, हर चीख मेरी सच्ची हुई॥
कोई खा रहा था, किसी का पेट काटकर,
कोई नहा रहा था, बरसात जो बची हुई॥
चल रहे थे साथ मिलकर, एक आगे सटक गया,
बाकि हाथ मलते रहे, दूजे कहें ये अच्छी हुई॥
हमें तो अपनों ने मारा, गेरों में कहाँ दम था ,
पता भी न चला , न पहचान उबरी दबी हुई॥
चीखों में चीखे निकलती रही, हर बार क़यामत आती रही,
शमशान से दुरी कम न रही, बस बर्बाद कभी न कमी हुई॥
संभालें रखूं चीख मेरी आखरी बची हुई।
ये गई, वो गई, हर चीख मेरी सच्ची हुई॥
सव-रचित- भजन सिंह घारू
संभाले रखूं चीख मेरी आखरी बची हुई।
ये गई ,वो गई, हर चीख मेरी सच्ची हुई॥
कोई खा रहा था, किसी का पेट काटकर,
कोई नहा रहा था, बरसात जो बची हुई॥
चल रहे थे साथ मिलकर, एक आगे सटक गया,
बाकि हाथ मलते रहे, दूजे कहें ये अच्छी हुई॥
हमें तो अपनों ने मारा, गेरों में कहाँ दम था ,
पता भी न चला , न पहचान उबरी दबी हुई॥
चीखों में चीखे निकलती रही, हर बार क़यामत आती रही,
शमशान से दुरी कम न रही, बस बर्बाद कभी न कमी हुई॥
संभालें रखूं चीख मेरी आखरी बची हुई।
ये गई, वो गई, हर चीख मेरी सच्ची हुई॥
सव-रचित- भजन सिंह घारू
तीन मंत्रियों की दरकार
तीन मंत्रियों की दरकार,
कहिये जनाब , आपकी है सरकार।
मेरे तीन मंत्री हैं ! है दरकार, है दरकार॥
मार्ग बदला ,सिंदांत छोड़ा, साथ पकड़ा है तुम्हारा।
तुम चाल चलो, हर बार लात खाय , यहीं किस्मत है हमारा॥
तुम्हारी सत्ता ही बदल देगें, हर बंद है कामकाज।
मेरे तीन मंत्री हैं, है दरकार, है दरकार॥
मेरे शेत्र में विचरण करना हो, इनका साथ जरुरी है।
दशिन की गंगा में दुबकी, तो खैरात बटाना जरुरी है।
नंबर एक बन्दा हो तेरा, तो शर्म न करो सरकार॥
मेरे तीन मंत्री है, है दरकार, है दरकार॥
सव-रचित -भजन सिंह घारू
कहिये जनाब , आपकी है सरकार।
मेरे तीन मंत्री हैं ! है दरकार, है दरकार॥
मार्ग बदला ,सिंदांत छोड़ा, साथ पकड़ा है तुम्हारा।
तुम चाल चलो, हर बार लात खाय , यहीं किस्मत है हमारा॥
तुम्हारी सत्ता ही बदल देगें, हर बंद है कामकाज।
मेरे तीन मंत्री हैं, है दरकार, है दरकार॥
मेरे शेत्र में विचरण करना हो, इनका साथ जरुरी है।
दशिन की गंगा में दुबकी, तो खैरात बटाना जरुरी है।
नंबर एक बन्दा हो तेरा, तो शर्म न करो सरकार॥
मेरे तीन मंत्री है, है दरकार, है दरकार॥
सव-रचित -भजन सिंह घारू
Saturday, May 7, 2011
भाषा
भाषा,
भाषा कोई भी हो उस का सार्थक ज्ञान होना जरुरी है। भाषा एक विचारों को आदान -प्रदान करने का एक झरिया है, जिस से हम एक-दूजे के विचारों को समझ व् आत्मसात कर लेतें हैं। हाँ यह जरुर मैं कहूँगा की आज के समय में ऊँचा दिखाने के लिए अंग्रेजी को अधिक महत्व देतें हैं, यह नहीं की उन को हिंदी नहीं आती बल्कि यह है की उन को अंग्रेजी भी अच्छी तरह से नहीं आती। यह कहीं नहीं लिखा हुआ की अच्छी हिंदी जानने वाला अच्छी हिंदी बोल सकता है, और यह भी कहीं नहीं लिखा हुआ की अच्छी अंग्रेजी जानने वाला अच्छी अंग्रेजी बोल सकता है। यहाँ एक बात और भी कह देना जरुरी समझता की भाषा से किसी की विधद्ता को नहीं नापा जा सकता ।
मि० बाकलीवाल तथा मैं भी हिंदी में लिखता हूँ कितने लोग आपको और मेरे विचारों को पढ़ते या फोलो करते हैं। नेताओं , अभिनत्रियों तथा अन्य उच्च लोगों के बोल्ग्स का सब पीछा करते हैं।
गुलामी की बू हम से दूर नहीं हो प् रहीं ,
खेलों हमारा पसीना बहा । चद लोग अपनी तोंद भर गए ।
द्वारा-भजन सिंह घारू
भाषा कोई भी हो उस का सार्थक ज्ञान होना जरुरी है। भाषा एक विचारों को आदान -प्रदान करने का एक झरिया है, जिस से हम एक-दूजे के विचारों को समझ व् आत्मसात कर लेतें हैं। हाँ यह जरुर मैं कहूँगा की आज के समय में ऊँचा दिखाने के लिए अंग्रेजी को अधिक महत्व देतें हैं, यह नहीं की उन को हिंदी नहीं आती बल्कि यह है की उन को अंग्रेजी भी अच्छी तरह से नहीं आती। यह कहीं नहीं लिखा हुआ की अच्छी हिंदी जानने वाला अच्छी हिंदी बोल सकता है, और यह भी कहीं नहीं लिखा हुआ की अच्छी अंग्रेजी जानने वाला अच्छी अंग्रेजी बोल सकता है। यहाँ एक बात और भी कह देना जरुरी समझता की भाषा से किसी की विधद्ता को नहीं नापा जा सकता ।
मि० बाकलीवाल तथा मैं भी हिंदी में लिखता हूँ कितने लोग आपको और मेरे विचारों को पढ़ते या फोलो करते हैं। नेताओं , अभिनत्रियों तथा अन्य उच्च लोगों के बोल्ग्स का सब पीछा करते हैं।
गुलामी की बू हम से दूर नहीं हो प् रहीं ,
खेलों हमारा पसीना बहा । चद लोग अपनी तोंद भर गए ।
द्वारा-भजन सिंह घारू
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