Saturday, May 7, 2011

आज फिर हुआ

आज फिर हुआ,
आज फिर हुआ पढ़ा अखबार जो विश्व में बिकता है तथा खबर जो चित्रों सहित छपी बड़ा दुःख हुआ की जिस भगवान् की हम पूजा करते हैं उसकी तस्वीरें जूतों ,चपलों की पर हों तो हमारी बीमार मानसिकता की निशानी हैं। व्योपार या धंधें के लिए भगवान् की तोहीन ठीक नहीं। धन के लालाचिओं को समझना चाहिए की हम से ऊपर भगवान है उस की मर्जी के बिना पत्ता भी हिल नहीं सकता , जो कोई भी उस से ऊपर जाने की कोशिश करता है तो वह जल्दी ही उसकी अपनी तैयारी भी करा देता है। वैसे हर इंसान को अपने आप ही समझना होगा की जिस से अपनी जीने की दुआ व् आशिशें लेता है उसी को पेरों मे घसीटें कहाँ तक जायज है। एस लिए मेरा मानना है की हमें घटिया कामों से बचना चाहिए। ताकि हम उस के परकोप से बच सकें। आशा करता हूँ की जो भी गूगल ब्लोग्स के माद्यम से एन विचारों को पढ़े तो वह अपने अन्य दोस्तों को भी बतये।
द्वारा- भजन सिंह घारू

Wednesday, May 4, 2011

नतीजा

नतीजा,
बुरे काम का बुरा नतीजा ,
क्यों भाई चा-चा , अरे हाँ भतीजा,
कबीर जी भी इसी तरह फरमाते हैं, '' बोये पेड़ खजूर का तो आम कहाँ से होए ।
आदमी जो कुछ भी करता है उसका हर एक पल का हिसाब ऊपर वाले के पास रहता है। कौन कितना धनवान है कितना ताकतवर है यह कोई मायने नहीं रखता बस हिसाब रहता है तो इसका की किस ने कितने भले काम किये हैं। और उसे उसी का फल भुगतने के लिए तैयार रहना होगा । अगर कोई मैं में चूर है तो वह सब से बड़ा मुर्ख आदमी है। अंत आदमी को परिणाम को झेलने की भी तैयारी रखनी होगी।
द्वारा- भजन सिंह घारू

Tuesday, April 26, 2011

सत्य साईं बाबा



सत्य साईं बाब़ा को शर्दान्जली

एव मेरा शत-शत नमन

Friday, April 22, 2011

आ रे बदरा

आ रे बदरा ,
आ रे बदरा आ रे बदरा तू जल्दी से प्यास बुझा।
न हम को तू तडपा, बस जल्दी से तू आ॥
धरती का जीव तड़प रहा है,
ये जंगल भी जल रहा है,
मानव बहुत हो मजबूर चला है,
अब तो साथ निभा ॥ बस जल्दी से तू आ॥
सावन सुखा-सखा है,
उसने भी क्या देखा है,
चारों ओर ख़ामोशी है,
अपना ही राग सुना॥ बस जल्दी से तू आ॥
अब बहुत हुआ न कहर ढा,
कुछ तो रहम कर न तडपा ,
हम बन्दे हैं तेरे उस प्रीतम के,
जिसका तुम पर प्यार फला॥ बस जल्दी से तू आ॥
द्वारा रचना -भजन सिंह घारू

क्या कहिये

क्या कहिये ,
मेरी तरह जो तुम भी रोओं , शान तुमारी क्या कहिये।
ठुमक-ठुमक तुम चलते जाओ ,आन तुमारी क्या कहिये॥
उलझी लत ये,कोई देखें, जान तुम्हारी क्या कहिये॥
सीना जो धक्-धक् धडके है,परेशान बेचारी क्या कहिये॥
सौ-सौ चूहे खाएके बिल्ली चली है, सरेआम बेचारी क्या कहिये॥
बांटे हैं सब कुछ , लगता न फिर कुछ , सामान बेचारी क्या कहिये॥
घूस खोरी पर ये वो जा बैठे, इमान बे -चारी क्या कहिये॥
सब के मालिक समझे अब तो, भगवान बे-चारी क्या कहिये॥
स्व-रचित द्वारा- भजन सिंह घारू

दुःख

दुःख ,
मैंने अपनी स्व रचित रचनों को मरकजी महकमें से छापने की गुजारिश की थी , परन्तु उसने एस टिपणी के साथ लौटा दी की यह मानने लायक नहीं है भगवान ऐसी सोच वालो का जल्दी ही इतजाम करेगा जो नाग की तरह कुंडली मरे बैठे हैं । मैं ऐसी घटिया सोच के लोगो की कड़े शब्दों मैं निंदा करता हूँ। अगर वे इसे पढ़े तों अपना मुंह अयने में देख कर ढक ले ताकि शर्म से लजित न हों।
द्वारा-भजन सिंह घारू

Tuesday, April 12, 2011

चिन्ता

चिन्ता, चिन्ता व् फिकर एक शब्द लगता है। पर इसको समझाने की जरूरत है। सब अपने आप में व्यस्त हैं । नीतियाँ बनाने वाले अपने में मस्त हैं। कोई तो बेखर है व् कोई जनबुजकर अनजान है । कर सकता है पर उसे अपने को सवारने के अलावा समय नहीं है। कौन किसकी फिकर करेगा यह सवाल बड़ा है। बड़ी मछली छोटी मछली को खा रही है। सब देख रहें हैं कोई बोलने वाला नहीं । ऊपर वाला सब पर नजर रखे हुय है। उससे वो डरते नहीं हैं। हडियाँ जबाव दे रहीं हैं तब भी वो इकठा करने में लगा हुआ हैं। पूरा जाल उसने बिछा लिया है । फिर भी मन उस का नहीं भरा है। शायद एस से आगे का मार्ग उस के पास हो। !! चिन्ता पर चिंतन होना चाहिए !! धन्यवाद ! द्वारा-भजन सिंह घारू